पारदर्शिता
ऊपर चेतावनी लगा देने भर से भरोसा नहीं बनता। इसलिए यहाँ वह लिखा है जो आमतौर पर नहीं लिखा जाता — यह साइट बनी कैसे, इसमें क्या गलत निकला, और आज भी क्या ठीक नहीं है।
मैं ब्लॉक समदड़ी में BLMT हूँ। प्रशिक्षण में सबसे अधिक समय यह ढूँढ़ने में जाता था कि कौन-सी बात किस दस्तावेज़ में है — मार्गदर्शिका का कोई अध्याय, नियमों का कोई पृष्ठ, या आयोग का कोई आदेश जो पिछले आदेश को हटा चुका है। सब अलग-अलग पड़ा था। इसे एक जगह इकट्ठा करने के लिए यह साइट बनाई।
बनाते समय Claude (Anthropic) साथ रहा — लिखने में, सजाने में और जाँचने में। यह छिपाने की बात नहीं है, इसलिए हर पन्ने के ऊपर लिख दिया गया है।
पर इसके साथ एक बात कह देनी चाहिए। मशीन से जब गलती होती है, तब भी वह उतने ही विश्वास से लिखती है जितने विश्वास से सही बात लिखती है। वाक्य ठीक रहता है, क्रम ठीक रहता है, केवल तथ्य गलत होता है। ऐसी गलती पकड़ना उस गलती को पकड़ने से कठिन है जो पढ़ते ही दिख जाती है।
जहाँ किसी नियम, आदेश या प्ररूप का नाम आता है, वहाँ कड़ी लगी है। दबाने पर दस्तावेज़ ठीक उसी पृष्ठ पर खुलता है, पहले पृष्ठ पर नहीं। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि आपको मेरी बात मानकर चलना न पड़े।
सितम्बर में तीन सिमुलेशन की स्वतंत्र जाँच कराई — भूमिका-अभ्यास, ईवीएम लैब और MPSV प्रतिरूप। बाकी अस्सी पन्नों की विषय-वस्तु अभी इस तरह नहीं जाँची गई है, यद्यपि कड़ियाँ सभी पन्नों की हर बार जाँची जाती हैं। पहली जाँच में 122 कमियाँ निकलीं। मैंने सब सुधारीं, और मान लिया कि काम हो गया।
फिर दुबारा जाँच कराई, इस बार अपने ही सुधारों की। उनमें 47 अधूरे निकले। एक ही गलती दो जगह थी और सुधार केवल एक जगह लगा था। कारण मेरी अपनी स्क्रिप्ट की एक पंक्ति थी — वह पहली जगह बदलकर रुक जाती थी और पर्दे पर “ok” छाप देती थी। मैं उसे “हो गया” समझता रहा।
इससे यह नहीं निकलता कि मशीन झूठ बोलती है। इससे यह निकलता है कि वह उसी प्रश्न का उत्तर देती है जो पूछा गया हो। मैं पूछ रहा था “सुधार लगा?”; पूछना यह चाहिए था कि “जहाँ-जहाँ लगना था, क्या सब जगह लगा?”
दूसरी जाँच में 281 विषय-कथन मूल दस्तावेज़ों से एक-एक कर मिलाए गए। 18 जगह अन्तर मिला — कहीं डायरी का गलत बिन्दु, कहीं नियम का दायरा ज़रूरत से बड़ा, कहीं वह अंक जो किसी और बूथ का था। सब ठीक किए जा चुके हैं, और हर सुधार से पहले वह पन्ना मैंने स्वयं खोलकर पढ़ा। ऊपर लिखा 99% इसी का है।
दो बातें ऐसी थीं जिन्हें पहले “जाँचा नहीं जा सकता” मान लिया था — परिपत्र 2292 और आदेश 2184 केवल चित्र-स्कैन हैं, उनमें पढ़ने लायक पाठ है ही नहीं। बाद में वे पन्ने चित्र बनाकर आँख से पढ़े गए, और दोनों बातें वहीं मिल गईं। इसलिए अब कोई विषय-कथन ऐसा नहीं बचा जो अपने स्रोत से अलग कहता हो।
इसके अलावा कड़ियों की कुछ कमियाँ हैं — कड़ी सही दस्तावेज़ खोलती है पर ठीक उसी अनुच्छेद पर नहीं उतरती। वे अलग गिनी गई हैं, इस अंक में नहीं, क्योंकि उनसे बात गलत नहीं होती — केवल ढूँढ़ने में समय लगता है।
और जो जाँचा ही नहीं गया, वह भी लिख देना चाहिए: भूमिका-अभ्यास की ब्राउज़र-जाँच दोनों बार अधूरी रह गई, और वह जाँच जो यह बताती कि “किस चीज़ को किसी ने देखा ही नहीं” — वह शुरू ही नहीं हो पाई।
कहीं कुछ खटके तो पहले उसी कड़ी को दबाकर मूल देख लीजिए। मूल और यह साइट अलग कह रहे हों तो मूल ही सही है, यह पन्ना नहीं। ड्यूटी पर मान्य वही है जो आयोग के आदेश, नियम और आपके अपने प्रशिक्षण में कहा गया हो।
और मुझे बता दीजिए। यही सबसे बड़ी मदद है। epicbharat@gmail.com पर कौन-सा पन्ना और कौन-सी पंक्ति खटकी, इतना लिख दीजिए। बहुत है।